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Half Ticket Ghode

Product Description

उन सात सालों मे जब, तेंदुलकर भगवान बना, भारत ने उदारीकरण की राह पकड़ी, केबल टीवी का जन्म हुआ, बाबरी मस्जिद ढही, राजीव गाँधी की हत्या हुई, दिव्या भारती की मृत्यु हुई, हर्षद मेहता ने घोटाला किया| उन सात सालों में, ग्यारह से अठारह साल की उम्र के बच्चे क्या सोचते थे? ‘हॉफ टिकट घोड़े’ उन्हीं सात सालों की कहानी है। यह इतनी दिलचस्प हो सकती है, बिल्कुल अहसास नहीं था। इरादा था उस उम्र के बाल मनोविज्ञान को पकड़ना। ये किया तो क्यों किया, वो कहा तो क्यों कहा। बहुत सारे विवाद है, झड़पें हैं। डर है कि मसले जो अब सुलझ चुके हैं, उन्हें कहीं मैं फिर से उलझा न लूँ। स्वार्थ है, पार्थ! निरा स्वार्थ|

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About the Author

पीलीभीत के एक गाँव में जन्मे अबीर की पढ़ाई सैनिक स्कूल घोड़ाखाल, नैनीताल में हुई। हरकोर्ट बटलर टेक्निकल यूनिवर्सिटी से केमिकल इंजीनियरिंग में डिग्री ली। ‘आईआईटी खड़गपुर’ में पढ़ाई के बाद ‘आईआईएम कलकत्ता’ से मैनेजमेंट में डिप्लोमा किया। पिछले तेरह सालों से अबीर इंडस्ट्री से जुड़े हुए हैं। इस्पात, ऑयल एंड गैस, ऑटोमोटिव और स्पेशिलिटी केमिकल जैसे क्षेत्रों में वह काम कर चुके हैं। फिलहाल, वडोदरा स्थित एक केमिकल कंपनी में कार्यरत हैं। अबीर के पहले कहानी संग्रह ‘सिर्री’ को जागरण नीलसन बेस्टसेलर संग्रह घोषित किया गया। हाल ही में उनका दूसरा कहानी संग्रह ‘भँवर’ प्रकाशित हुआ है। उनका उपन्यास ‘ताजमहल छ: फिट नीचे’ हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में प्रकाशित हुआ है। द्विभाषीय कविता संग्रह ‘पापा-अन ओड तो फादर’ भी प्रकाशित हो चुका है।