Krishna : antim dino me

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अपने प्रयाण के निष्कर्ष पर पहुँचने के बाद कृष्ण को एक बार पुनः अपना बचपन याद आ गया। जब वे सुबह उठकर माता यशोदा और बाबा नन्द के चरण स्पर्श करते थे तो आशीष देते हुए उन लोगों की जिह्वा थकती नहीं थी। माँ उन्हें नहला धुला कर तैयार करतीं, फिर वे पास के शिव मन्दिर में जाकर पूजन करके आते तो माँ उन्हें मक्खन, दूध और फल का कलेवा करातीं। उन्हें अपने बचपन की शरारतें याद आने लगीं। माँ बहुत मेहनत से उनके लिए दूध से दही और मक्खन तैयार करती थीं और वे चोरी से उसे अपने मित्रों को बाँट देते थे, इस कार्य में उनसे बहुधा दही या मक्खन की मटकी फूट जाया करती थी। माँ को उनकी इस शरारत पर हँसी तो आती ही थी, वे परेशान भी हो जाया करती थीं।
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About the Author

सेन्ट्रल बैंक ऑफ इण्डिया से सेवानिवृत्त, डॉ. अशोक शर्मा ऐतिहासिक और पौराणिक पात्रों को केन्द्र में रख कर उपन्यास लिखने के लिये जाने जाते हैं। आपके पूर्व प्रकाशित दो उपन्यास ‘सीता सोचती थीं’ और ‘सीता के जाने के बाद राम’ प्रस्तुति में तथ्य-परक दृष्टि एवं पात्र गठन की विशेषता तथा अपनी रोचकता के कारण जाने जाते हैं, जिसमें वे सभी पात्रों के साथ समुचित न्याय करने में सफल रहे हैं। ‘कृष्ण : अन्तिम दिनों में’ के अंग्रेजी अनुवाद ‘Krishna : In His Last Days’ के साथ-साथ आपके दो काव्य संग्रह ‘श्री कृष्ण शरणम्’ एवं ‘मेरे पंख मेरा आकाश’ भी प्रकाशित हैं। प्रस्तुत उपन्यास में भी पात्र-गठन में कृष्ण के साथ-साथ अन्य सभी पात्रों के कद के साथ कोई समझौता नहीं हुआ है, फिर भी रोचकता तथा पठनीयता निरंतर बनी रहती है।